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योगी पीर भोलानाथजी
ॐ
॥ योगी पीर भोलानाथजी ॥
॥ ॐ शिव गोरक्ष ॥
॥ ॐ शिव गोरक्ष ॥
- महापुरुष इस जगत में, छिपे कही अपार ।
- सद्भाग्य-ईश्वर कृपासे, दर्शन होत कभी कभार ॥
- ईश्वर भरा चराचर में, स्वरुप जिसका निराकार ।
- जिज्ञासू दिन रात करे, उसी ईश्वर की पुकार ॥
- सफलता ना मिले, केवल जब दिखे अंध:कार ।
- भाव उठे मन में, प्रयत्न गये सबही बेकार ॥
- अशांतता व्याप्त चित्त से, वह भटके द्वारोद्वार ।
- सोचे मनही मन में, ईश्वर क्यों न सुने पुकार ॥
- अगाध लीला ईश्वर की, भेजे संतो के द्वार ।
- विनित होय जो चरणोंपर, कृपादृष्टीसे लेते अंदरसे निखार ॥
- सहज शब्द उपदेश के, पर ताकद अपरंपार ।
- उतरे मन की गहराईमें, होवत असरदार ॥
- अंतर्यामी ईश्वर के राह पर खडे, दुश्मन विचार विकार ।
- धैर्य शक्ति दे सामना की, करके उनसे खबरदार ॥
- सच्चा साधक जान ले, शब्द अनुभव सार ।
- ताकद मिले शब्दोंसे चलनेको, जगे उत्साह अपार ॥
- लेत ना कुछ पर देत जो, विश्वास शक्ति अपार ।
- उसी से जीव करत है, माया को सहजी पार ॥
- पथ है दुर्गम कॉंटेवाला, पर न मानना कायरता से हार ।
- चल निकल आगे वीर, भर दे मन में विश्वास अपार ॥
- निश्चलतासे बैठे ध्यान मे, भागे विचार जो बेकार ।
- शांति आनंद की गहराईमें साधक डुबे, ना रहे समय विचार ॥
- यही यही है संतोंकी, कृपा अपरंपार ।
- ईश्वर ने रखे है मार्ग में, कार्य करने उसके द्वार ॥
- कृष्णदास दर्शन किया, योगी भोलानाथ पीर ।
- प्रेम उपदेश सुमिरन में, नयनों भर गया नीर! ॥
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॥ सिंहासनीस्थित वामन मूर्ती, श्री गुरुदत्त कृष्ण सरस्वती ॥
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