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परमार्थ साधना पथक्रमण
ॐ
॥ परमार्थ साधना पथक्रमण ॥
परमार्थ साधना
ॐ
- जगती असे वर्तणे | कुणा काही न कळणे |
- निज साधनेत रमता | विश्वी उगेचि असणे ॥१॥
- परमार्थी मी न काही | जगतो असेच जगणे |
- साधना न काही कळते | सद्गुरु समर्थ जाणे ॥२॥
- लौकिक सोहळे जगात | परमार्थी तैसे अनंत |
- सावध रहावे दूर | साधनी होउनी चूर ॥३॥
- गुरुभाव न वृद्धी तेथे | अहंवृद्धी होते |
- निजस्वार्थे बुद्धी दाटे | कलुषित मनही होते ॥४॥
- जगी संप्रदाय नाना | अपुलाच श्रेष्ठ जाणा |
- ऐसे मनी न आणा | तोचि सुज्ञ जाणा ॥५॥
- गुरुबंधू भगिनी जेष्ठ | मानिती स्वत:सी श्रेष्ठ |
- आपण बरे कनिष्ठ | अज्ञानी एकनिष्ठ ॥६॥
- आहारी न जा कुणासी | निजबुद्धि कौल घेणे |
- विवेक दावी मार्ग | नि:शंक सदा अनुसरणे ॥७॥
- आग्रहा बळी न पडता | धैर्य राखुनी असणे |
- स्वीकारुनी इष्ट तेचि | प्रतिपादी तेचि स्पष्ट ॥८॥
- मंडूक कूपातील जे | कूपात नित्य रमती |
- विस्तीर्ण अफाट जगती | विहरण्यासी मुकती ॥९॥
- संकुचित वृत्ती धरुनी | तैसे न सर्वथा होणे |
- मुक्त विशाल भावे | ईशतत्त्व आकळावे ॥१०॥
- मधुभृंग विविध पुष्प | हेरुनि सेवितो मधुसी |
- विश्वी ज्ञान विखुरले | वेची कणाकणासी ॥११॥
- परमार्थ शुष्कतेचा | ना कधी आचरावा |
- दुर्मुखल्या वदनी | ना जनी दर्शवावा ॥१२॥
- उत्साह नित अपार | हे परमार्थ सार |
- सारासार विचार | दूर सार ते असार ॥१३॥
- आनंद अनुभवुनिया | आनंद उधळावा |
- आनंद ठेवा तेवि | सर्वांसवे लुटावा ॥१४॥
- गुरुनाम नित्य वदनी | गुरुमूर्ति नित्य ध्यानी |
- गुरुबोध नित्य मननी | ऐसा काल क्रमावा ॥१५॥
- जो तो मतिप्रमाणे | परमार्थ आकळितो |
- तेविच आचरोनि | जाया पुढे पहातो ॥१६॥
- क्रममार्ग आचरिता | मतिकलंक हळूच झडतो |
- भ्रम व्यर्थ जाणिवेचा | हळूहळू नाश होतो ॥१७॥
- नाहीच दूर कोठे | काहीच ना ते गवसे |
- हृदयीच नित्य वसते | ध्यानी अंती येते ॥१८॥
- तत्त्व जाणता हे | शांति परम गवसते |
- खटपट साधनेचि सफळ सर्वथा होते ॥१९॥
- परमार्थ साधनेचा | पथ केवि आक्रमावा |
- ध्यानी हाच घ्यावा | करी कृष्णदास दावा ॥२०॥
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॥ सच्चिदानंददायक किर्ती, श्री गुरुदत्त कृष्ण सरस्वती ॥
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