गोरखनाथ

श्रीगोरक्षनाथ आरती

आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ, आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ ॥धृ.॥
हरिनारायण अवतार तू, मछिन्द्र बालक अयोनिज तू
दीनजनांसी उद्धरण्यासी, अवतरलासी दीनानाथ तू
नमितो आम्ही तव चरणांसी, कृपाकर, ठेवी त्वरित माथा ऽऽ
आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ ॥१॥
बालार्क तनू भस्मविभूषित, जटाभार तो माथा शोभत
कानी कुंडले माळ रुद्राक्ष, कफनी भगवी तनु सुशोभित
शिवशंकर तू अवनी विचरसी, दर्शन, देई सत्वरी आता ऽऽ
आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ ॥२॥
गहिनी कारण अडभंगी चौरंगी, भरतरी नृपती शोक विनाशक
गुरुभक्तीचा उतुंग मेरू तू, भक्ति ज्ञान अन् योग विशारद
शरणांगतासी वज्रपंजरु, शरणी तव, घेई पदरी त्वरिता ऽऽ
आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ ॥३॥
विषयकर्दमी लोळत आम्ही, स्वस्वरुपाचे विस्मृत भानी
जन्ममरण या खेपा करता, भवतापे या पोळत निशिदिनी
सोडवुनि निजानंदी रमविण्या, तुजवीण, नाही दुजा त्राता ऽऽ
आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ ॥४॥
‘ॐ शिव गोरख’ नामजपता, तत्क्षणी प्रकटसी कृपाळू ताता
साधनमार्गी अडधडपडता, कृपादृष्टीने निरखिसी त्वरिता
कृष्णदास तव पावन चरणी, घालितो, घट्ट मिठी आता ऽऽ
आरती शिवगोरखनाथा ऽऽ ॥५॥


श्री मच्छिंदनाथ आरती  
नाथ मछिंदर आरती तुजसी नमुनि योगिवरा, नमुनि योगिवरा
उभवी कृपाकरा, दीनावरी, कृपा करा सदया ॥धृ.॥
मत्स्योदरी तू कविनारायण आलासी उदया
आदिनाथ गूज श्रवणी ज्ञानी झालासी विनया ॥१॥
तपे तोषवुनि अत्रिनंदन, कृपा केलीसे तू संपादन
जगदुद्धारा तेचि कृपाधन अर्पिलेसी सदया ॥२॥
प्रसन्न करुनि सर्व दैवते, रचिली अपार साबरी कविते
देवादिकही तव सामर्थ्ये, शरणी तव पाया ॥३॥
गोरखजतीसमशिष्योत्तमतुज, नाथपंथ हा वाढवी सहजी
त्रिलोकी या नाथपंथीचा, वाजतसे डंका ॥४॥
स्मरणीऽऽ तव, भयभीत माया जातसे विलया
जीवदशा हो विगलित ब्रह्म स्वरुप दिसे ठाया ॥५॥
‘अलख निरंजन’ श्रवणी मन हे, पावतसे विलया
‘आदेश’ करुनि कृष्णदास हा शरणी तव पाया॥६॥


 

दंड कमंडलू घेऊनि हाती चालली दत्तांची स्वारी
अलख निरंजन अलख निरंजन गर्जते नाथांची वारी ॥
भस्मविभूषित काया शोभे शिवशंकरांचे परी
जटाभार तो रुळतो अपार प्रत्येकाच्या शिरी ॥
गोरख मछिंदर सवे चालती, बाल मीन पुढे पळे तुरतुरी
जालिंदर अन् शिष्य कानिफा, रेवण चरपट नाथ भरतरी ॥
अडभंगीसह नाथ चौरंगी पहा चालले दिसती अवनीवरी
दृष्य पाहुनि आनंदाच्या लाटा उसळती अपार हृदयांतरी ॥
खड्‌खड खडावा, चट्‌चट् चिमटा, शिंगीचा नाद घुमे अंबरी
‘अलख निरंजन’ पडता कानी, ‘आदेश गुरुजी’ नमितो कृष्णदास हा त्वरी ॥
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अलख निरंजन अलख निरंजन, आया नाथ गोरख
बोल सुनकर मछिंदर घबराया, न रहेगा अब मुझे नारी का सुख
गोरख बोला चलो गुरुजी, रहना नही है हमे यहॉं जी
दिया बचन जो हनुमानजी, समझो है वह पूरा हुआ जी
हर तरह से देख लुभाया, गोरख बैरागी नही ललचाया
देख मछिंदर खुशी भर आया, गोरख को प्रीती गले लगाया
चेला मैने सही है पाया, नाथ गोरख सब जग गाया
सुमिरन होते नाथ गोरख का, कृष्णदास का दिल भर आया
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गोरख अवधूत भिडे सामने, लगायी शर्त आपसमे
छिपना है जिधर छिप ढूँढ मैं निकालूँगा
अवधूत बोले हँसकर, शर्त जरुर मैं मानूंगा
पहली पारी गोरख की, बदला रुप समय समय पर
प्राणी पक्षी हुए मीन, अवधूत ने पकडा सहज पहचानकर
अब पारी आई अवधूत की, गायब हो गया उस क्षण
ढूँढ ढूँढकर गोरख थके, पकड न सके पहचानकर
ढूँढी धरती, ढूँढा स्वर्ग, पाताल भी हुआ ढूँढकर
पता ना चला अवधूत का, छिप गया किधर रुप बदलकर
थका भागा शरण आया, अवधूत को हात जोडकर
प्रार्थना की शरण आपसे प्रभु, दर्शन देना प्रगट होकर
शरण देखकर गोरख को, दयालु प्रभु हुए साकार
शरणागत गोरख ने मॉंगी माफी, प्रभु के चरण पकडकर
बोले आप कहॉं छिपे थे, पहचान क्यूँ नहीं कर पाया
सिद्धि का अभिमान था मुझको, यह क्या है समझ ना पाया
सुन गोरख बोले अवधूत, जानो तुम सिद्धि रुप बदलना,
पंचभूतोंका आकार है जो, जानो तुम उसे बदलना
परे उसे है उनमे मिल जाना,
पंचभूतोंको अलग करके, हर एक को उसमे मिलाना
बोलो कैसे अब ढूँढ पाओगे, निराकार को क्या समझोगे,
जब तक अहम् ना भूलोगे, तब तक यह न जान पाओगे
बात जानकर यह अवधूत की, गोरख हुआ विगत अभिमान,
चरण पकड अवधूत के, कृपा से निराकार लिया जान
कृष्णदास कहे गुरुपुत्र को, जब तक है अभिमान,
निराकार गुरु स्वरूप को, कभी ना पाओगे जान
जाओ चलो शरण गुरु को, सदा पकडकर कान
कृपा उनकी होगी जब, तब ना रहेगा अहम् भान
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अलख निरंजन गर्जत गर्जत, नाथांचा हा मेळा चालत
सोऽहं सोऽहं डमरू बाजत, शिंगीचा नाद दुमदुमत
त्रिशूल हाती प्रचंड शोभत, ऐरावती हा कानिफ शोभत
गोरख भरतरी चरपट पटपट, नाथ मछिंदर पुढे चालत
कृष्णदास त्या समोर येता, आदेश गुरुजी म्हणुनि नमत
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ब्रह्मरस मे नहाया,गोरख अलख निरंजन गाया
मायाजाल को भस्मकरके, बभूत सरीर चढाया
नाथ मछिंदर गुरु ग्यानी का सपूत जगत कहलाया
सोहं हंस: उलट नाद से, प्राण गगन चढाया
सहस्रार मे शून्य गति कर, सहज स्थिती अपनाया
जोगी बनके देस बिदेस घूमनाथपंथ बतलाया
कृष्णदास यह गुरु गोरख के है नित गुण को गाया
ॐ शिव गोरख जाप सुनके गोरख दिल भर आया
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अलख निरंजन गात चला, यह तो गोरख नाथ भला
सून्य मै जो स्थित अखंड है, अपने आप मे रमत चला
गुरुभक्त जो, महाग्यानी जो, बैराग्य की जो परिसीमा
तिनो लोक मे नित करत जो, क्षणही मे संचार भला
भावभक्ति से शरण जो आवे, करत जो उनकी रक्षा भला
कृष्णदास यह नाथ वरिष्ठ की, रखे दरसनकी आस भला
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वड्यासाठी दिला स्वनेत्र सहजी स्वये काढून
स्त्रीपाशातून सोडविला गुरू मोह सारा त्यागून
नष्ट गुरुदेह आणिला परत सुरअसुरांशी लढून
सोन्याचा केला अवघा पर्वत केवळ लघुशंका करून
नाथसंप्रदाय पसरविला जगी तीर्थयात्रा करून
अशा या सिद्ध नाथ गोरक्षा,
कृष्णदास करतो नमन निजहृदयातून
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अलख निरंजन अलख निरंजन, आया नाथ गोरख
बोल सुनकर मछिंदर घबराया, न रहेगा अब मुझे नारी का सुख
गोरख बोला चलो गुरुजी, रहना नही है हमे यहॉं जी
दिया बचन जो हनुमानजी, समझो है वह पूरा हुआ जी
हर तरह से देख लुभाया, गोरख बैरागी नही ललचाया
देख मछिंदर खुशी भर आया, गोरख को प्रीती गले लगाया
चेला मैने सही है पाया, नाथ गोरख सब जग गाया
सुमिरन होते नाथ गोरख का, कृष्णदास का दिल भर आया
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अडबंगी है बहुत ही न्यारा, कुछ भी बतावे करे उल्टा सारा
खेत मे खाना खाने बैठा था, गोेरख भूखा जा रहा था
देखकर उठा बोला पधारो, भोजन का स्वीकार करो
भूखा गोरख तृप्त हुआ, जो चाहे वह मांग बोला
सुनकर बोला तुम्हे क्या करना, जावो अपनी वाट सुधारो
उल्टा बोला तुम हो भिखारी, ले जावो अपनी सवारी
नाथ गोरख हटकर बैठा, कुछ तो बेटा मांग बोला
माणीक अडबंगी बोला जाओ, नही मॉंगना कुछ भी मुझे
गोरख बोला फिर मै मॉंगू, है कबूल तो बचन देना
अडबंगी बोला दिया बचन, मॉंग जो चाहे वो मै दूंगा
गोरख बोला मन का मत सूनना, बचन लेकर गया निकल
खडा हुआ अडबंगी जो तो, मन का सारा दिया त्याग
जहॉ खडा था वही खडा रह, लेकर हरिनामरह गया खडा
बारह साल बाद गोरख लौटा, देखा जहा था, वही खडा था
तप देखकर हुआ प्रसन्न, आशीर्वाद देकर किया सनाथ
नौ नाथो में बहुत प्रसिद्ध, हुआ ऐसे अडबंगी नाथ
बिनती करत कृष्णदास, निश्‍चय हो जैसे अडबंगी नाथ
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गोरख अवधूत भिडे सामने, लगायी शर्त आपसमे
छिपना है जिधर छिप ढूँढ मैं निकालूँगा
अवधूत बोले हँसकर, शर्त जरुर मैं मानूंगा
पहली पारी गोरख की, बदला रुप समय समय पर
प्राणी पक्षी हुए मीन, अवधूत ने पकडा सहज पहचानकर
अब पारी आई अवधूत की, गायब हो गया उस क्षण
ढूँढ ढूँढकर गोरख थके, पकड न सके पहचानकर
ढूँढी धरती, ढूँढा स्वर्ग, पाताल भी हुआ ढूँढकर
पता ना चला अवधूत का, छिप गया किधर रुप बदलकर
थका भागा शरण आया, अवधूत को हात जोडकर
प्रार्थना की शरण आपसे प्रभु, दर्शन देना प्रगट होकर
शरण देखकर गोरख को, दयालु प्रभु हुए साकार
शरणागत गोरख ने मॉंगी माफी, प्रभु के चरण पकडकर
बोले आप कहॉं छिपे थे, पहचान क्यूँ नहीं कर पाया
सिद्धि का अभिमान था मुझको, यह क्या है समझ ना पाया
सुन गोरख बोले अवधूत, जानो तुम सिद्धि रुप बदलना,
पंचभूतोंका आकार है जो, जानो तुम उसे बदलना
परे उसे है उनमे मिल जाना, पंचभूतोंको अलग करके, हर एक को उसमे मिलाना
बोलो कैसे अब ढूँढ पाओगे, निराकार को क्या समझोगे,
जब तक अहम् ना भूलोगे, तब तक यह न जान पाओगे
बात जानकर यह अवधूत की, गोरख हुआ विगत अभिमान,
चरण पकड अवधूत के, कृपा से निराकार लिया जान
कृष्णदास कहे गुरुपुत्र को, जब तक है अभिमान,
निराकार गुरु स्वरूप को, कभी ना पाओगे जान
जाओ चलो शरण गुरु को, सदा पकडकर कान
कृपा उनकी होगी जब, तब ना रहेगा अहम् भान